प्रोबेशनर पद पर अम्बेडकर को खुशी मिली या ...
बड़ौदा महाराज ने डॉ आंबेडकर को महालेखाकार के कार्यालय में प्रोबेशनर पद पर नियुक्त किया ।
सुबह 10 बजे सराय से कार्यालय के लिए निकल जाते थे और रात में 8 बजे वापस सराय पहुंच जाते थे। 👉 अम्बेडकर कहते हैं, " मेरा प्रयास रहता था कि मेरा अधिक से अधिक समय मित्रों की संगत में सराय के बाहर ही कटे। "
रात काटने के लिए सराय में लौटने का विचार मेरे लिए अत्यंत भयावह होता था और मैं सराय में बस इसलिए लौट कर आता था कि मेरे पास उस नगर में और कोई ऐसा स्थान नहीं था जहाँ मैं विश्राम के लिए जा सकता।
सराय की पहली मंजिल पर बने इस हॉल में कोई नहीं था, जिससे मैं बात कर पाता । मैं बिल्कुल अकेला था । पूरा हॉल घोर अंधकार में डूबा रहता था , अंधेरा छांटने के लिए यहां न कोई बिजली थी और ना ही तेल की कुप्पियाँ। पारसी नौकर मेरे प्रयोग के लिए एक छोटी सी लालटेन ले आता था लेकिन उसका प्रकाश भी कुछ इंच से आगे नहीं पहुंच पाती थी
मुझे लगता था मैं किसी काल कोठरी में बंद हूँ और किसी व्यक्ति से मिलकर उससे बातचीत करने की मेरी बहुत इच्छा होती थी ,लेकिन वहां कोई होता ही नहीं था। आदमी का साथ ना मिलने पर मैं पुस्तकों का साथ पकड़ लेता था और बस पढ़ता ही रहता था ,पढ़ता ही रहता था । पढ़ाई में डूब कर मैं अपने अकेलेपन को भूल जाता था । लेकिन चमगादड़ों ने उस हॉल को अपना घर बना रखा था और उनकी चिक-चिक और फड़फड़ाहट से बहुधा मेरा ध्यान उचट जाता था और एक फुरफुरी मेरे सारे शरीर में दौड़ जाती थी तब मुझे वह याद हो आता था जिसे भूलाने का मैं प्रयास कर रहा था, अर्थात यह कि मैं एक अनजान स्थान पर विचित्र स्थिति में था । कई बार तो निसंदेह मुझे बहुत क्रोध भी आया। लेकिन मैंने अपने दुख और क्रोध को इस भावना के साथ दबा दिया कि भले ही यह कालकोठरी हो फिर भी यह था तो बसेरा ही । कोई और बसेरा ना होने से कैसा भी बसेरा होना कहीं अच्छा था । मेरी स्थिति इतनी हृदय विदारक थी कि जब मेरा भांजा मुंबई से मेरा शेष सामान लेकर आया, जिसे मैं वहीं छोड़ आया था, तो मेरी दशा देखकर इतनी जोर जोर से रोने लगा कि मुझे उसे तुरंत वापस भेजना पड़ा। इस प्रकार ऐसी स्थिति में मैं पारसी सराय में एक पारसी बन कर रहा । मैं जानता था कि मैं अधिक दिनों तक यह स्वांग ( नाटक ) नहीं कर सकता, क्योंकि एक ना एक दिन मेरी चोरी पकड़ी जानी थी । इसलिए मैं रहने के लिए सरकारी बंगला लेने के प्रयास में लगा था लेकिन प्रधानमंत्री मेरे अनुरोध पर तत्परता से विचार नहीं कर रहे थे। मेरी अर्जी (प्रार्थना- पत्र) एक से दूसरे अधिकारी तक चक्कर ही काटती रही और इससे पहले कि मुझे अंतिम उत्तर मिलता , मेरे लिए कयामत (प्रलय) का दिन आ पहुंचा ।
नितांत अकेले और स्वास्थ्य के लिए बहुत खराब एवं कष्टदायक स्थितियों में उस सराय में मैं केवल 10 दिन ही रह पाया ।
सराय में टिकने का यह मेरा 11 दिन था। मैं सुबह खाना खाकर कपड़े बदलने के बाद दफ्तर के लिए अपने कमरे से निकलने ही वाला था। मैं पिछली रात लाइब्रेरी से ली गई कुछ पुस्तकें वापस करने के लिए उठा रहा था कि मुझे सीढ़ियों पर कई लोगों के ऊपर चढ़ने की आहट सुनाई दी। मैंने सोचा कि सैलानी होंगे, यहां ठहरने के लिए आए होंगे , लेकिन मैं बाहर झांक कर देखने लगा कि यह लोग कौन थे ? तभी मुझे एक दर्जन लंबे - तगड़े और हटे - कट्ठे पारसी दिखाई दिए, जिनके हाथों में लाठियां थी । गुस्से में भरे ये पारसी मेरे ही कमरे की ओर आ रहे थे । तब मेरी समझ में आया कि यह साथी सैलानी नहीं थे और उन्होंने तुरंत ही इसका प्रमाण भी दे दिया। वे मेरे कमरे के समक्ष पंक्ति बांध कर खड़े हो गए और मुझ पर प्रश्न पर प्रश्न दागने लगे ।
"तुम कौन हो ?
" यहां क्यों आए हो ?
"मक्कार ! तुमने पारसी सराय को पवित्र कर के रख दिया ।"
मैं चुपचाप खड़ा रहा, मैं कोई उत्तर नहीं दे पाया,मैं और स्वांग नहीं कर सकता था।यह वास्तव में धोखाधड़ी थी और मेरी धोखाधड़ी पकड़ी गई थी तथा यह निश्चित बात थी कि जो खेल मैं खेल रहा था, यदि उस पर मैं अड़ा रहता तो ये लोग क्रोध में भरे धर्मांध पारसी मुझे बुरी तरह से पीटते और संभव है कि मुझे मौत के घाट भी उतार देते । मेरी विनम्रता और मेरी चुप्पी ने इस कयामत को टाल दिया । उनमें से एक ने मुझे पूछा कि मेरा कब खाली करने का विचार है । उस समय अपने बसेरे को मैं अपनी जान से अधिक कीमती समझता था इस प्रश्न में जो धमकी छुपी हुई थी वह बहुत ही गंभीर थी , इसलिए मैंने अपनी चुप्पी तोड़ी और उनसे प्रार्थना की कि मुझे 1 सप्ताह और सराय में रहने दें । मैं सोच रहा था कि बंगले के लिए प्रधानमंत्री को दिए हुए मेरे निवेदन पत्र पर इस बीच निर्णय हो जाएगा । परंतु वे पारसी लोग कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं थे । उन्होंने मुझे अंतिम चेतावनी दे डाली कि मैं उस रात को उन्हें सराय में दिखाई ना दूं, अपना सामान लेकर चलता बनूं। ऐसा न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देकर वे चले गए । मैं परेशान हो गया, मेरा हृदय डूबने लगा, मैं सभी को भला बुरा कहने लगा और फूट-फूट कर रो पड़ा । अंततः मुझसे मेरी अनमोल संपत्ति अर्थात मेरा बसेरा छीन लिया गया था। यद्यपि यह किसी कैदी की कोठरी से कम नहीं था, लेकिन मेरे लिए यह बहुत अनमोल था.........
स्रोत: नानकचंदरत्तू की लिखी हुई किताब से हृदय विदारक लाइनें , शेष बाकी हैं 😪😥
जय भीम
जवाब देंहटाएंजय भीम
जवाब देंहटाएंबहुत दुख हुआ जानकर
जवाब देंहटाएंबहुत बुरा हुआ बाबासाहेब के साथ
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