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इतनी बड़ी साजिश बाबा साहेब के साथ ही क्यों

क्या आपने सोचा भारत सरकार द्वारा दूसरी पार्लियामेंट एनेक्सी का निर्माण क्यों करवाया गया

जातियों की संख्या इतनी अधिक है कि बिना किसी विशेष सहायता के एक सामान्य व्यक्ति के लिए उनकी एक पूरी सूची बना लेना आसान नहीं है । 1935 में भारत सरकार ने इस प्रकार की एक सूची तैयार की थी । वह 1935 के ही गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट के अधीन निकाले गए "ऑर्डर इन काउंसिल" (आज्ञापत्र) के साथ संलग्न है।यह लंबी सूची 9 भागों में विभक्त है एक भाग का संबंध एक प्रांत से है और उसमें उस प्रांत की उपजातियों, नस्लों, कबीलों अथवा उन समूहों की गणना की गई, जो सारे प्रांत अथवा उसके एक हिस्से में अछूत माने जाते हैं । यह सूची विस्तृत और प्रमाणित अथवा प्राधिकृत कही जा सकती है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए हिंदू लोग जातियों की कितनी बड़ी संख्या को वंशानुगत या जन्मजात अछूत मानते हैं, मैं "ऑर्डर इन काउंसिल" की वह सूची यहां दे रहा हूं :--

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क्या आप विश्वास करते हो कि इस्लाम में छुआछूत है

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भारत के बाहर निश्चित तौर पर नस्ल और जाति बन्धन को तोड़ा है इस्लाम ने , मगर वह भारत में अपने उद्देश्य पर सफल नहीं रहा है। यहां डॉ. अम्बेडकर अपने अनुभव उदाहरण के रूप में बता रहे हैं। 👇👇👇 (यहां डॉ. अम्बेडकर    दौलताबाद  के किले की घटना   का विवरण  देते हैं, जहां वह अस्पृश्य वर्ग के आंदोलन के साथियों के साथ सन 1934 में गए थे) 💢 सन् 1934 में अस्पृश्य वर्ग के आंदोलन के मेरे कुछ साथियों ने यह इच्छा व्यक्त की कि अगर मैं उनके साथ चलने को सहमत हो जाऊं, तो वे दर्शनीय स्थल देखने जाना चाहेंगे । मैं सहमत हो गया । यह तय हुआ कि हम अपने कार्यक्रम में वेरुल की बौद्ध गुफाओं को हर हाल में सम्मिलित करेंगे । कार्यक्रम यह बना कि मैं नासिक जाऊंगा और बाकी लोग मुझे वहीं मिलेंगे वेरूल जाने के लिए हमें औरंगाबाद पहुंचना था । औरंगाबाद कस्बा हैदराबाद के मुसलमान राज्य में है और निजाम की रियासत का एक भाग है । औरंगाबाद जाते समय हमें एक और कस्बे दौलताबाद से होकर गुजरना पड़ा । यह कस्बा भी हैदराबाद राज्य में आता है दौलताबाद एक ऐतिहासिक स्थान है और कभी यह एक प्रसिद्ध हिंदू...

पानी से सम्बंधित यह घटना जयपुर की है

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सम्पूर्ण वाङ्गमय खण्ड - 9 पेज 180 to 181 दिल दहला देने वाली घटना सम्पूर्ण वांग्मय खण्ड - 9 पेज 180 to 181  परिशिष्ट 1.  में छपे सभी प्रेस- समाचार  इस पुस्तक की मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि के अंत में पाए गए हैं।  - संपादक अस्पृश्यता  के कारण  हालात  बद से बदतर,  27 जून 1953  के स्टेट्समैन में प्रकाशित जयपुर  से एक संवाददाता ने जून 1953 की घटना का समाचार भेजा जो निम्नलिखित है  यह घटना 27 जून 1953 के स्टेटमेंट में प्रकाशित  जयपुर 25 जून इस राज्य में  गिनी वार्म नामक बीमारी  फैली हुई है जिसे  यहां के लोग नारू अथवा बाल भी कहते हैं इसके कारण रोगी को महीनों कष्ट उठाना पड़ता है। कभी-कभी तो एक-दो वर्ष भी लग जाते हैं।  इसके कारण अनेक रोगियों के तो अंग बेकार हो जाते हैं। यह बीमारी पाइन के पानी के माध्यम से फैलती है।  रोकथाम के लिए डॉक्टर केवल यही सलाह देते हैं पहले पानी को उबालो, छानों और फिर उसे पियो। यह बीमारी बहुधा उस समय फैलती है जब वर्षा ऋतु प्रारंभ होती है, जो खेतों में बुवाई का मौसम होता है।...

ब्राह्मणों ने कोई वाल्टेयर क्यों पैदा नहीं किया -

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सम्पूर्ण वांग्मय 14th में डॉ. बाबासाहेब डॉक्टर अंबेडकर ने कहा कि यह मेरी पुस्तक The Shudra - हू दे वर एंड हाउ दे केम टु बी दि फोर्थ वर्ण ऑफ इंडो आर्यन सोसायटी, जिसका प्रकाशन 1946 में हुआ था । अंतः परिणाम है । शूद्रों के अतिरिक्त हिंदू सभ्यता ने तीन और वर्णों को जन्म दिया । इसके अतिरिक्त किसी और वर्ग के अस्तित्व की ओर वांछित ध्यान नहीं दिया गया है। यह वर्ग हैं :-- 1. जरायम पेशेवर कबीले, जिनकी संख्या लगभग 2 करोड़ है। 2.  आदिम जातियां, जिनकी संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है। 3.  अछूत जातियां जिनकी संख्या लगभग 5 करोड़ है। बाबासाहेब आगे कहते हैं इन वर्गों का अस्तित्व एक कलंक है।  इन सामाजिक सृष्टियों के संदर्भ में यदि हिंदू समाज को  मापा जाए तो इसे कोई सभ्य समाज नहीं कह सकता।  मानवता का उत्पीड़न और दमन करने के लिए इसका यह एक पैशाचिक धुर्तता है नाम उसका तो कलंक होना चाहिए। उस सभ्यता को और क्या नाम दिया जाए जिसने ऐसे समाज को जन्म दिया हो,  जिसे अपने भरण पोषण के लिए अपराध करने की मान्यता प्राप्त हो।  एक अन्य वर्ग को सभ्यता के नाम पर आदि काल से ही बर्...

प्रोबेशनर पद पर अम्बेडकर को खुशी मिली या ...

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बड़ौदा महाराज ने डॉ आंबेडकर को महालेखाकार के कार्यालय  में प्रोबेशनर पद पर नियुक्त किया । सुबह 10   बजे सराय से कार्यालय के लिए निकल जाते थे और रात में 8  बजे वापस सराय पहुंच जाते थे। 👉  अम्बेडकर कहते हैं, " मेरा प्रयास रहता था कि मेरा अधिक से अधिक समय मित्रों की संगत में सराय के बाहर ही कटे। " रात काटने के लिए सराय में लौटने का विचार मेरे लिए अत्यंत भयावह होता था और मैं सराय में बस इसलिए लौट कर आता था कि मेरे पास उस नगर में और कोई ऐसा स्थान नहीं था जहाँ मैं विश्राम के लिए जा सकता। सराय की पहली मंजिल पर बने इस हॉल में कोई नहीं था, जिससे मैं बात कर पाता । मैं बिल्कुल अकेला था । पूरा हॉल घोर अंधकार में डूबा रहता था , अंधेरा छांटने के लिए यहां न कोई बिजली थी और ना ही तेल की कुप्पियाँ। पारसी नौकर मेरे प्रयोग के लिए एक छोटी सी लालटेन ले आता था लेकिन उसका प्रकाश भी कुछ इंच से आगे नहीं पहुंच पाती थी मुझे लगता था मैं किसी काल कोठरी में बंद हूँ और किसी व्यक्ति से मिलकर उससे बातचीत करने की मेरी बहुत इच्छा होती थी ,लेकिन वहां कोई होता ही नहीं था। आदमी का साथ ना...