बड़ौदा महाराज ने डॉ आंबेडकर को महालेखाकार के कार्यालय में प्रोबेशनर पद पर नियुक्त किया । सुबह 10 बजे सराय से कार्यालय के लिए निकल जाते थे और रात में 8 बजे वापस सराय पहुंच जाते थे। 👉 अम्बेडकर कहते हैं, " मेरा प्रयास रहता था कि मेरा अधिक से अधिक समय मित्रों की संगत में सराय के बाहर ही कटे। " रात काटने के लिए सराय में लौटने का विचार मेरे लिए अत्यंत भयावह होता था और मैं सराय में बस इसलिए लौट कर आता था कि मेरे पास उस नगर में और कोई ऐसा स्थान नहीं था जहाँ मैं विश्राम के लिए जा सकता। सराय की पहली मंजिल पर बने इस हॉल में कोई नहीं था, जिससे मैं बात कर पाता । मैं बिल्कुल अकेला था । पूरा हॉल घोर अंधकार में डूबा रहता था , अंधेरा छांटने के लिए यहां न कोई बिजली थी और ना ही तेल की कुप्पियाँ। पारसी नौकर मेरे प्रयोग के लिए एक छोटी सी लालटेन ले आता था लेकिन उसका प्रकाश भी कुछ इंच से आगे नहीं पहुंच पाती थी मुझे लगता था मैं किसी काल कोठरी में बंद हूँ और किसी व्यक्ति से मिलकर उससे बातचीत करने की मेरी बहुत इच्छा होती थी ,लेकिन वहां कोई होता ही नहीं था। आदमी का साथ ना...
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